बुद्ध जयंती आज: यहां मिला था सिद्धार्थ को दिव्य ज्ञान
बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध की जयंती इस साल यानि 2020 में 7 मई,गुरुवार को आज मनाई जा रही है। दरअसल वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी वन में ईसा पूर्व 563 को हुआ। उनकी माता अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास उस काल में लुम्बिनी वन हुआ करता था वहीं पुत्र को जन्म दिया।
इसी दिन (पूर्णिमा) 528 ईसा पूर्व उन्होंने बोधगया में एक वृक्ष के नीचे जाना कि सत्य क्या है और इसी दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में दुनिया को कुशीनगर में अलविदा कह गए।
भगवान बुद्ध ने भले ही बौद्ध धर्म की स्थापना की हो मगर हिन्दू धर्म में इन्हें भगवान विष्णु का ही अवतार माना जाता है। जीवन जीने के मायने बताने वाले गौतम बुद्ध के अनुयायी इस दिन को बड़ी धूम से मनाते हैं। अपने प्रवचनों में सुखी जीव और सफल जीवन के कई राज बताए हैं। उनकी दी हुई शिक्षा आज भी लोगों की जीवन का मूल मंत्र माना जाता है। महात्मा बुद्ध से ही जुड़ा है एक वृक्ष। जिनके नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
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कोरोना: बुद्ध ने बचाया था वैशाली को महामारी से...
वर्तमान में जहां देश दुनिया पर कोरोना महामारी का आतंक छाया हुआ है। वहीं अंगुत्तर निकाय धम्मपद अठ्ठकथा के अनुसार एक समय वैशाली राज्य में तीव्र महामारी फैली हुए थी। मृत्यु का तांडव नृत्य चल रहा था। लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि इससे कैसे बचा जाए। हर तरफ मौत थी। लिच्छवी राजा भी चिंतित था। कोई उस नगर में कदम नहीं रखना चाहता था। दूर दूर तक डर फैला था। तब भगवान बुद्ध ने यहां रतन सुत्त का उपदेश दिया जिससे लोगों के रोग दूर हो गए।
गौतम बुद्ध को ऐसे प्राप्त हुआ ज्ञान-
गौतम बुद्ध का जीवन हर किसी के लिए प्रेरणादायी है। उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। 35 वर्ष की आयु में ही उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। संसार का मोह त्याग कर तपस्वी बन गए थे और परम ज्ञान की खोज में चले गए थे।
दरअसल सिद्धार्थ बचपन से ही करुण दिल वाले थे। किसी का दुख नहीं देख सकते थे। वहीं एक बार कपिलवस्तु की गलियों में उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी। ये दृश्य थे एक वृद्ध विकलांग व्यक्ति, एक रोगी, एक पार्थिव शरीर और एक साधु। इन दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गए थे कि सब का जन्म होता है और सब बूढ़े होते हैं, सभी बीमार होते हैं और एक दिन सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इन्हें जानकर उन्होंने अपना सबकुछ त्यागकर साधु का जीवन अपना लिया।
यहां मिला ज्ञान...
गृह त्यागने के बाद सिद्धार्थ ने अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढने शुरू किए। पूरा ध्यान लगाने के बाद भी जब उन्हें ज्ञान नहीं मिला। तो इसके बाद कठोर तपस्या छोड़कर एक पीपल के पेड़ के नीचे प्रतिज्ञा करके बैठ गए कि वह सत्य जाने बिना नहीं उठेंगे। बताया जाता है वो सारी रात उसी वृक्ष के नीचे बैठे रहे। यही वह क्षण था जब उन्हें पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ।
बताया जाता है कि बिहार के बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इस बोधगया में बोधी वृक्ष को देखने हर साल देश-विदेश से लाखों की संख्या में लोग आते हैं। साल 2012 में महाबोधि वृक्ष की एक टहनी टूटकर गिर गई थीं। टहनी टूटने को अपशकुन माना गया था। तब ये कयास लगाया जा रहा था कि ये पवित्र वृक्ष धीरे-धीरे मृत्यु की अग्रसर होने वाला है मगर ये वृक्ष पूरी तरह स्वस्थ्य है।
ऐसे समझें गौतम बुद्ध के पंचशील सिद्धांत...
बुद्ध द्वारा प्रदान किए गए पंचशील सिद्धांत जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। ऐसे में इन सिद्धांतों का पालन कोई भी कर सकता है, फिर चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला ही क्यों न हो।
पंचशील सिद्धांत यह नहीं बताते कि क्या गलत है और क्या सही, बल्कि यह हमें जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं। यह सिद्धांत हमें बताते हैं कि हम ईमानदारी से तय करें कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत...
भगवान बुद्ध ने पालि भाषा में पंचशील के सिद्धांत: जो हिन्दी में इस प्रकार हैं...
1. प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना।
2. चोरी करने या जो दिया नहीं गया है उससे विरत रहना।
3. लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना।
4. असत्य बोलने से विरत रहना।
5. मादक पदार्थों से विरत रहना।
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