Breaking: पूरा देश लॉकडाउन हो तभी कुछ राहत की सांस आएगी, दुनिया की मानें तो बड़े खौफ के साए में हैं हम
नई दिल्ली
देश के 23 राज्य और 82 शहरों में लॉकडाउन कर दिया गया है। रेल से लेकर बसों तक के पहिए थाम दिए गए हैं। संभव है कि आने वाले दिनों में पूरा देश ही लॉक डाउन कर दिया जाए। लेकिन क्या यह सब कुछ पर्याप्त है? यह सवाल इसलिए खड़ा हो गया है, क्योंकि ब्रिटेन के प्रतिष्ठित इंपीरियल कॉलेज ने कोरोना वायरस पर अपनी रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट आशंका व्यक्त करती है कि जिन तैयारियों के साथ पूरी दुनिया इस वायरस से लड़ने की कोशिश कर रही है, वह काफी नहीं है। अगर इन तैयारियों के साथ आगे बढ़े तो मरने वालों की संख्या लाखों में हो सकती है।
रिपोर्ट कहती है कि इन हालातों में अकेले ब्रिटेन में मरने वालों का आंकड़ा पांच लाख पार कर सकता है, जबकि अमेरिका में यह संख्या 22 लाख तक जा सकती है। वहीं हिंदुस्तान में यह 35 लाख तक पहुंच सकती है। ऐसे में जरूरत है, हमें संभलने की और समझदारी के साथ तैयारियों में बदलाव करने की। आखिर क्या कहती है रिपोर्ट और क्या जरूरत है हमें खुद भी करने की...
फुल लॉकडाउन की जरूरत
अमेरिका और ब्रिटेन पूरी तरह से लॉक डाउन हो गए हैं, जबकि अभी हमारे देश में पूरा लॉकडाउन होना बाकी है। रिपोर्ट की शुरुआत ही यही कहती है कि बिना पूरे लॉक डाउन के यह संभव ही नहीं है कि लड़ाई को व्यवस्थित किेया जा सके। पूरे लॉकडाउन के पीछे रिपोर्ट का दावा है कि ऐसा करने से इसको फैलने से काफी हद तक रोका जा सकता है और इसके दौरान सरकार को अपनी मेडिकल सुविधाओं को दुरुस्त करने का मौका मिल जाएगा। दोनों चीजों को एक साथ ही करना होगा।
इटली के हालातों से तुलना करें तो वहां पर मेडिकल सुविधाएं चरमरा गई हैं। वहां डॉक्टरों को तय करना पड़ रहा है कि किसे इलाज दें और किसे मरने के लिए छोड़ दें। ऐसे हालातों से जूझने के लिए सरकारों को अभी से तैयारी करनी पड़ेगी।
लंबा चल सकता है लॉक डाउन
अगर रिपोर्ट की मानें तो भारत जैसे देश को करीब एक महीने का लॉक डाउन करना पड़ सकता है। ऐसे में उसे कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे लोगों की जेब में पैसा होगा कि नहीं होगा? उनके पास खाने—पीने का सामान होगा या नहीं होगा? इसके साथ ही वायरस का बढ़ता दबाव भी उनके मनोबल को तोड़ देगा। ऐसे में इस तरह की बातों को ध्यान में रखकर ही निपटने की तैयारियों के साथ आगे बढ़ना होगा।
अगर डाटा स्टडी के हिसाब से देखें तो रिपोर्ट कहती है कि अगर दुनिया भर में जिस तरह से कोरोना कहर बरपा रहा है तो मेडिकल सुविधाओं का इंतजाम एक बड़ा नंबर लेकर करना होगा। उसके डाटा के हिसाब से कर्नाटक जैसे राज्य को 80 हजार मरीजों की आंकड़ा लेकर चलना होगा। बेंगलुरू जैसे शहर को 16 हजार मरीजों का नंबर देखना होगा और उसके लिए 2400 की क्षमता वाला अस्पताल तैयार करना होगा। जिसमें दो हजार बेड का आईसीयू हो और उसमें हजार वेंटिलेटर क्षमता हो।
कितनी मेडिकल तैयारियों की जरूरत
- हर बड़े शहर को एक हजार बेड की क्षमता वाला अलग अस्पताल चाहिए। जिसमें सभी वेंटिलेटर हों और उसमें आक्सीजन, सक्सन और कम्प्रेस्ड एयर की पर्याप्त सुविधा हो। अगर कोरोना मरीजों को सामान्य के साथ मिलाएंगे तो 40 फीसदी मरीजों में कोरोना बढ़ने की आशंका रहेगी।
- कोरोना अस्पतालों को सेंट्रल पाइप आक्सीजन की जरूरत होगी। दुनिया भर में ज्यादातर मरीजों की मौत अस्पतालों के भीतर आक्सीजन नहीं मिलने के कारण हुई।
- डॉक्टरों की व्यवस्था दो लेयर में होनी चाहिए। एक जो स्क्रीनिंग करें और इलाज सुझाएं, जबकि दूसरे आईसीयू के भीतर काम करें।
- जिन मरीजों को क्रिटिकल केयर की जरूरत नहीं है, उन्हें कोरोना अस्पतालों में इलाज दिया जाए और जिन्हें ज्यादा क्रिटिकल केयर की जरूरत है, उन्हें उन निजी अस्पतालों में भेजा जाए जहां पर बेहतर क्रिटिकल केयर हो। इसके लिए सरकार अभी से तैयारी करके रखे।
- सामान्य बीमारियों जैसे बुखार के लिए आनलाइन अस्पताल खोले जाएं। जहां पर आनलाइन ही सलाह दी जाए और लक्षण के हिसाब से उन्हें आगे का रास्ता सुझाया जाए।
- कोरोना अस्पतालों में काम करने वालें स्टॉफ को सबसे पहले सेफ्टी सिखाई जाए, कैसे सेफ इलाज करना है।
- दो हजार आईसीयू के लिए छह घंटे की चार शिफ्ट के लिए 700 नर्स, दो सौ डॉक्टर, 100 इंटेंसिव केयर प्रति शिफ्ट जरूरत होगी।
- हमारे देश में वेंटिलेटर की कमी है, दूसरे देश इस समय उपलब्ध कराने की हालत में नहीं हैं। ऐसे में जरूरत है कि हम लोकल स्तर पर काम करने वाली कंपनियों को युद्ध स्तर पर बनाने के लिए कहें और उन कंपनियों को सरकारी सपोर्ट सिस्टम दें।
- मेडिकल के फाइनल ईयर के स्टूडेंट्स को आईसीयू में बतौर इंटर्न काम करने के लिए लगाया जाए, जिससे डॉक्टरों की कमी को पूरा किया जा सकता है।
हमको क्या करना है?
अगर हमें इससे मिलते जुलते लक्षण नजर आते हैं तो हमें खुद को सात दिन के लिए घर के भीतर ही आइसोलेट होना है। इस दौरान हमें घर के लोगों से भी दूरी बनानी है। यानि हम घर के लोगों से मिलना जुलना भी 75 फीसदी तक कम कर दें। अगर लक्षण घर के लोगों के भीतर भी नजर आ रहे हैं तो उन्हें 14 दिन के लिए आइसोलेट होना चाहिए और बाहरी लोगों से संपर्क लगभग तोड़ देना चाहिए। 70 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग करनी चाहिए। उन्हें 75 फीसदी तक लोगों से मिलना—जुलना कम करना होगा। आम आदमी को भी 75 फीसदी तक लोगों से मिलना—जुलना पूरी तरह से बंद करना चाहिए और घर के भीतर भी 25 फीसदी तक घटा देना चाहिए।
इटली जैसा हाल किया तो हालात बुरे होंगे
रिपोर्ट साफ कहती है कि इन हालातों में ब्रिटेन में पांच लाख, यूएस में 22 लाख और भारत जैसे देश में मरने वालों की संख्या 35 लाख तक जा सकती है। ऐसे में मेडिकल तैयारियां इसी को ध्यान में रखकर करनी होंगी। इटली का हवाला देते हुए रिपोर्ट कहती है कि अगर वहां जैसा किया तो हालात और बुरे हो सकते हैं। इटली ने 300 डॉक्टर चाइना से बुलाए हैं जो आईसीयू सर्विस को देख रहे हैं जो कि पूरी तरह से अपर्याप्त हैं।
दुनिया भर से सीखे और आगे बढ़े भारत
रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि यह वो समय है जब सभी देशों को एक—दूसरे की गलतियों को देखकर सीखने की जरूरत है। ऐसी गलतियों का दोहराव नहीं होना चाहिए। ऐसे में भारत के सामने बेहतर विकल्प है कि वह पूरी दुनिया के सामने एक नया सवेरा पेश करे। बताए कि वह कैसे इस बीमारी के भयंकर परिणामों को बदल सकता है। लेकिन यह तभी संभव है कि जब देश के साथ आम आदमी भी साथ आए।
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