73rd Independence Day: इन 5 इकोनॉमिक मुसीबतों से कैसे मिलेगी मोदी सरकार को आजादी
नई दिल्ली। पूरा भारतवर्ष आज आजादी की 73वीं वर्षगांठ मना रहा है। बीते 73 सालों में भारत ने विश्व पटल पर कई उंचाइयों को छुआ। आज लाल किले के प्राचीर से अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि साल 2014 से पहले हम केवल 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था थे। बीते पांच साल में हमने अर्थव्यवस्था में एक ट्रिलियन डॉलर के इजाफे के साथ 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गये हैं। साथ ही उन्होंने एक बार फिर 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के बारे में जिक्र किया। आइये जानते हैं कि मौजूदा समय में भारत के लिए आर्थिक मोर्चे पर क्या चुनौतियां हैं।
1. खपत में कमी : वर्तमान में कई सेक्टर में सुस्ती का दौर देखने को मिल रहा है। कार, टू-व्हीलर से लेकर ट्रैक्टर तक के सेल्स में भारी गिरावट आई है। बीते चार महीनों में नॉन-ऑयल, नॉन-गोल्ड और नॉन-सिल्वर आयात में कमी आई है। इन सबसे एक बात साफ है कि अर्थव्यवस्था में खपत और मांग की कमी है। आम लोग उतना खर्च नहीं कर रहे, जितना वो पहले खर्च करते थे। हालांकि, सरकार इसके लिए कई कदम उठा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इस साल लगातार चार बार रेपो रेट में कटौती किया है। हाल ही में जारी हुआ खुदरा महंगाई दर, थोक महंगाई दर और इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन के आंकड़े भी कुछ ऐसी ही तस्वीर बयां कर रहे हैं।
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2. सरकारी बैंक व एनबीएफसी बैंकों का हालत : बीते कुछ साल से पब्लिक सेक्टर बैंकों के हालत कुछ खास ठीक नहीं रहा है। 31 दिसंबर 2018 तक बैंकों पर फंसे हुए कर्ज का कुल बोझ 8.64 लाख करोड़ रुपये था। पिछले दो वित्त वर्ष में सरकार ने इन बैंकों को रिकैपिटलाइजेशन के तहत 2.06 लाख करोड़ रुपये दिया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण में इस बार इन बैंकों के लिए कोई पूंजी देने के बारे में जिक्र नहीं था। सरकार का मानना है कि कम से कम इस साल तो इन बैंकों को पूंजीगत सहायता की जरूरत नहीं है।
पिछले साल सितंबर माह में आईएलएंडएफएस डिफॉल्ट सामने आने के बाद गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों के लिए भी परेशानियां खड़ी हो गईं हैं। अधिकतर एनबीएफसी ने छोटी अवधि के लिए कर्ज लिया और उन्होंने लंबी अवधि के लिए उधार दिया है। इसका असर बैंकों पर भी देखने को मिला है। 18 मार्च 2019 तक, बैंकों द्वारा एनबीएफसी को दिये गये कर्ज की कुल रकम 3.52 लाख करोड़ रुपये रहा है, जोकि मार्च 2019 तक बढ़कर 6.41 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसका मतलब है कि बीते तीन सालों में इसमें कुल 80 फीसदी का इजाफा हुआ है।
3. निर्यात में कमी : आमतौर पर देखा जाता है कि किसी भी विकसित देश को विकासशील देश बनने के लिए निर्यात पर अधिक जोर देना पड़ता है। वित्त वर्ष 2018-19 में भारत से निर्यात होने वाले कुल वस्तुओं का मूल्य 329.6 हजार करोड़ रुपये था। यह पहली बार था जब निर्यात काफी अधिक था। लेकिन, ध्यान देने वाली है कि बीते कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार भी बढ़ा है। ऐसे में निर्यात में पर्याप्त बढ़ोतरी भी होना जरूरी है। सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के अनुपात में वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान कुल निर्यात 12.09 फीसदी रहा है। हाल के दिनों में निर्यात के मोर्चे पर भारत कई एशियाई देशों से पिछड़ चुका है। ऐसे में मौजूदा मोदी सरकार के लिए जरूरी है इस क्षेत्र पर भी ध्यान केंद्रित करे।
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4. सरकारी कंपनियों की खराब हालत : बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के आजादी के बाद साल 1951 में केवल 5 ही सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज थे। इन सभी कंपनियों का कुल निवेश मात्र 29 करोड़ रुपये ही था। मार्च 2018 तक देश में कुल 339 सीपीएसई थे, जिनका कुल निवेश करीब 13.73 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक का है। वित्त वर्ष 2017-18 में टॉप 10 सीपीएसई को करीब 98,707 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था।
हालांकि, इस दौरान टॉप 10 नुकसान वाले सीपीएसई को कुल 26,480 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और एअर इंडिया को क्रमश: 7,993 करोड़ रुपये और 5,338 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। कई अन्य सरकारी कंपनियां भी घाटे में हैं।
5. कृषि क्षेत्र : छोटी अवधि में कृषि क्षेत्र में परेशानी का सबसे बड़ा कारण खाद्य पदार्थों के मांग में कमी रही है। हालांकि, लंबी अवधि के भी कुछ कारण हैं। साल 2004-05 में कृषि, मत्स्य और वन का जीडीपी में कुल 21 फीसदी की हिस्सेदारी थी। लेकिन, अब तक यह गिरकर 13 फीसदी ही रह गया है। बीते कुछ समय में सरकार ने कई योजनाओं के माध्यम से इस क्षेत्र को दुरुस्त करने का प्रयास किया हैं, जिसका असर भी देखने को मिल रहा है।
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