भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा दोहरी लड़ाई लड़ने वाले, भारतीय पुनर्जागरण के प्रथम सूत्रधार, राजा राम मोहन राय

रू‍ढ़िवाद, कुरीतियों के विरोधी और संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव को सदैव अपने दिल के करीब रखने वाले राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। धर्म प्रचार के क्षेत्र में अलेक्जेंडर डफ्फ ने उनकी काफी सहायता की। देवेंद्र नाथ टैगोर उनके सबसे प्रमुख अनुयायी थे।

 

राजा राममोहन राय की दूर‍दर्शिता और वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। देश दुनिया के विद्वानों की राय में राजा राममोहन राय नये युग के अग्रदूत थे।

 

- मोनियर विलियम राजा राममोहन राय को तुलनात्मक धर्मशास्त्र के प्रथम सच्चे अन्वेषक मानते थे।

- सील राजा राममोहन राय को विश्व मानवता के विचार संदेशवाहक मानते हुए कहते थे, कि वे मानवतावादी, पवित्र तथा सरल थे। विश्व इतिहास में विश्व मानवता के दिग्दर्शन कराने वाले थे।

- मिस कोलेट के अनुसार, इतिहास में राममोहन राय ऐसे जीवित पुल के समान हैं, जिस पर भारत अपने अपरिमित भूतकाल से अपने अपरिमित भविष्य की ओर चलता है। वे एक ऐसे वृत खंड थे, जो प्राचीन जातिवाद तथा अर्वाचीन मानवता, अंधविश्वास तथा विज्ञान, अनियन्त्रित सत्ता तथा प्रजातंत्र, स्थिर रिवाज तथा अनुदार प्रगति, भयावने अनेक देवताओं में विश्वास तथा पवित्र, यद्यपि अस्पष्ट आस्तिकता के बीच की खाई को ढके हुए थे।


- नन्दलाल चटर्जी के अनुसार, राजा राममोहन राय अविनष्ट भूतकाल और उदित होते हुए भविष्य, स्थिर अनुदारता तथा क्रांतिकारी सुधार, अंध परम्परागत पृथकता तथा प्रगतिशील एकता के मध्य मानव सम्बंध स्थापित करने वाले थे। संक्षेप में वे प्रतिक्रिया तथा प्रगति के मध्य बिंदु थे।


- रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, राममोहन राय ने भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात किया। उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का पिता तथा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रवर्तक भी कहा जाता है उनके धार्मिक और सामाजिक सब विचारों के पीछे अपने देशवासियों की राजनीतिक उन्नति करने की भावना मौजूद रहती थी। वे आगे लिखते हैं कि मुझे यह खेदपूर्वक कहना पड़ता है कि हिन्दुओं की वर्तमान पद्धति उनके राजनीतिक हितों की दृष्टि से ठीक नहीं है। जात-पात के भाव ने उन्हें राजनीतिक भावना में शून्य कर दिया है। सैकड़ों हज़ारों धार्मिक कृत्यों और शुद्धता के नियमों ने उन्हें कोई भी कठिन काम करने के अयोग्य बना दिया है। मैं समझता हूं कि यह आवश्यक है कि उनके राजनीतिक लाभ और सामाजिक सुविधा के लिए उनके धर्म में कुछ परिवर्तन हो।



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